Kavita Jha

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मैंने भी तो भीतर अपने छिपा रखें हैं अनगिन भाव #लेखनी दैनिक काव्य प्रतियोगिता -18-Oct-2022

आल्हा छंद/वीर छंद
 (चौपाई+चौपई 16,15)
मैंने भी तो भीतर अपने,छिपा रखें हैं अनगिन भाव।

ढूंँढ रही शब्दों को ऐसे, लगे न जिससे कोई घाव।
मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखें हैं अनगिन भाव।।

कठिन पलों में हार न मानूंँ, इतनी ताकत दो भगवान ।
सात जन्म इनको ही पाऊंँ, इनसे ही मेरी पहचान।।
तुम्हीं बनाते जोड़ी सबकी, पार लगाते सबकी नाव।
मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखें हैं अनगिन भाव।।

सुख दुख चाहे  जितने आए, छूटे कभी न अब यह साथ।
सदा तुम्हारे साथ रहूँ मैं, हरदम हो हाथों में हाथ।।
गुस्से में भी लगते प्यारे,साजन तुम मत रखो तनाव।
मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखें हैं अनगिन भाव।।

समय बीत भी यह जाएगा , सभी समस्या होगी दूर।
अपने ही तो बने सहारे, जब कोई होता मजबूर।।
जिसके जो मन में है आता, देता जाता नया सुझाव।
मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखें हैं अनगिन भाव।।

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कविता झा'काव्या कवि'
राँची, झारखंड
#लेखनी दैनिक काव्य प्रतियोगिता 

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8 Comments

सुंदरतम सार्थक सृजन प्रशंसनीय।

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बहुत अच्छा लिखा है

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बहुत ही सुंदर और भावनात्मक अभिव्यक्ति

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